एक बेटी की कलम से

  1. बात उन दिनों की है,जब मैं बारहवीं की परीक्षाएँ देकर इंजीनियरिंग के entrance एग्जाम की तैयारी कर रही थी।मैं दिन रात एक करके पढ़ाई में जुटी रहती थी।बस एक ही खयाल रहता कि किसी तरह IIT में मेरा selection हो जाए।उन्ही दिनों गाँव से मेरे दादाजी दादी आए।दादाजी बीमार थे और उन्हें इलाज के लिए पटना लाया गया था।माँ दादी पापाजी और भैया सब उनकी सेवा में जुटे रहते थे और मैं अपनी पढ़ाई में ही ज्यादातर मशगूल रहती।हाँ बीच बीच में दादाजी का हाल चाल जरूर पूछ लिया करती थी।थोड़ी देर बैठकर उनसे बातें भी कर लिया करती थी।
  2. ऐसे ही चलता रहा और कुछ दिनों में दादाजी चलने फिरने से बिलकुल लाचार हो गए और बिस्तर पर ही पूरी तरह रहने लगे।इसी बीच माँ और दादी दोनों को ही बुखार आ गया और घर का सारा काम मेरे ही ऊपर आ गया।मेरे पास कोई उपाय ही नहीं था।घर का काम भी करती ,दादाजी को भी देखती और बाकी समय पढ़ाई में लगाती। मुझमें न जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गई।दादाजी भी मेरी तरफ दुखी नज़रों से देखते और कहते भी कि मेरे कारण तुम्हारी पढाई में बड़ी बाधा हो रही है।पर मैं मुस्करा कर उनकी बात को टाल देती और दुगुने जोश से काम में जुट जाती।
  3. काफी सेवा सुश्रुषा के बाद भी दादाजी ज्यादा दिन नहीं रहे। मेरा सिलेक्शन भी IIT में नहीं हुआ।पर AIEEE में मुझे counselling letter मिला।IIT में selection नहीं होने का दुःख तो हुआ पर जीवन के जिन संघर्षों से सामना करने के कारण मुझे अपनी क्षमताओं का पता चला वो अविस्मरणीय था।साथ ही हर कदम पर दादाजी का आशीर्वाद साथ रहा। इस बात का भी एहसास हुआ कि तन मन लगाकर जो काम करो वो अवश्य पूरा होता है।आज enjineer बनकर मैं अच्छी जगह job कर रही हूँ और दादाजी शायद कहीं दूर बैठे देख रहे होंगे और खुश भी होंगे कि मेरी मेहनत सफल हुई।
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