दूसरों की फितरत बदलने से पहले खुद को बदला जाये

कुछ दिनों पहले की बात है। बेटे से वीडियो गेम ले देने का वादा किया था।
मेरा शुरू से ही मानना रहा है क़ि बच्चों से कियेे गए ऐसे छोटे मोटे वायदे निभाएं जाएँ।
पता नहीं किस वजह से दो दिन टालने के बाद मेरे पति ने कहा की भूल गया….

हम भी उनके सामने निर्विकार बैठे रहे,लेकिन वहां से हटते ही रो पड़े। मन जैसे टूट सा गया। बात बहुत छोटी सी,नगण्य जैसी है लकिन बड़ा दुःख देता है..
उससे पहले की घटना है,शायद एक डेढ़ महीने पहले की…

पड़ोस में शादी थी,बहुत आग्रह से नहीं बुलाया गया था…तो मुझे लगा शायद ये जाने को उत्सुक न होंगे….

ये भी निर्विकार से बैठे रहे पूरे दिन…लेकिन शाम होते ही हत्थे से उखड गए और लगे मुझपर तोहमत लगाने…की ,उनके नहीं जाने की वजह मै ही हूँ।

निकट संबंधों  का ये बड़ा ही विचित्र पहलू है…हम मुह से कहते कुछ हैं और दिल से कुछ और चाहते रहते हैं..चाहते हैं की ..बिना कहे सामने वाला मेरे मन की बात समझ जाय।बात भी इतनी छोटी,इतनी महत्वहीन सी होती हैं की कहने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं,लेकिन उनके पूरे नहीं होने पर मन टूट जाता है।

विडिओ गेम प्रकरण में जब मैं दुखी उदास बैठी थी ,तो अपनी कही बात याद आ गयी
..अगर जाने का मन था तो…कहे क्यों नहीं।

लेकिन जब अपनी बारी  आयी तो कहाँ कह सके..मुझे आज चाहिये ही चाहिये।
फिर मन शांत हो गया…

दुसरे का judgement हम बड़ी आसानी से कर लेते हैं..लेकिन जब अपनी बारी आती है तो सारा तर्क शास्त्र धरा रह जाता है……
यही तो इन्सानी फितरत है….

नहीं तो super man न हो जाएँ….

0 Comments

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

CONTACT US

We're not around right now. But you can send us an email and we'll get back to you, asap.

Sending

©2017 Kuch Teri Kuch Meri. All rights reserved.

or

Log in with your credentials

Forgot your details?