एक माँ की डायरी के पन्ने

आज बरसों बाद रोना आया कुछ उस तरह का जैसा कभी 89-90 में आया था। एक बहुत ही कठिन परीक्षा जैसी स्थिति में अपने आप को डाल चुके थे।उस दिन भी बरामदे की ग्रिल को पकड़कर खड़े इनको जाते हुए देखते रहे थे आंसू थे कि रुक नहीं रहे थे। आज भी निशब्द होकर दूर तक इनको जाते हुए देखते रहे अनवरत बहते आंसुओं के बीच। उस वक्त मजबूरी थी साथ नहीं ले जा सकते थे।

माँ पिताजी से कहना कि बीवी बच्चों को साथ ले जायेंगे ये तो सोचा ही नहीं जा सकता था।आज तो मेरा चुनाव था। मुझे लगा कि मेरे बेटे को शायद मेरी जरूरत है। इन दिनों रोज़ शाम को आस्था चैनल पर brahmakumaris का प्रोग्राम देखते हैं। उससे लगता है कि पिछला कोई हिसाब है जो पूरा नहीं हुआ है। अभी भी माइनस में चल रहा है। लेकिन हमको कमज़ोर नहीं होना है। अपने आप को ठीक रखना है। हम अपना काम इमानदारी से किये हैं। जो भी साधन उपलब्ध था उससे बच्चों को पालने में कोई कमी नहीं रखे। हमको अपने काम में कोई त्रुटि नज़र नहीं आ रहा है।फिर भी अगर रहा हो तो आगे balance करेंगे।

 

 

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