सरकारी क्वार्टर कौन सा साथ ले जाना है

ओह, इस बार यदि मकान मालिक कमरो की रंगाई- पुताई करा देता तो बेहतर होता। अब तो दीवारों का रंग बिलकुल “मनहूस चौधरी अंकल” के घर सा लगने लगा है।

हमारे block में ऊपर के floor पर हमलोगों के quarter के बिलकुल तिरछे में रहते थे मनहूस से चौधरी अंकल । रंगाई पुताई करवाने में कोई रूचि नहीं; सरकारी क्वार्टर कौन सा साथ ले जाना है।

वैसे अंकल पापा से कम से कम 20 साल तो बड़े होंगे ही, पर कॉलोनी में हम सब को अंकल ही कहते थे। वो पापा के ही कार्यालय में क्लर्क थे। उनकी तीन बेटियाँ और एक बेटा था। एक दीदी की शादी हो चुकी थी जबकि दो कॉलेज में , भईया भी कॉलेज में ही थे शायद। शायद इसलिए क्योंकि जिनकी शादी  ना हुई हो और नौकरीपेशा भी ना हो और हमारे साथ स्कूल भी ना जाता हो, वे सभी भईया दीदी के लिए यही हमारी गणित थी।

खैर, आमूमन चौधरी अंकल शाम 6 बजे तक घर आ जाते थे और एक-आध घंटे में तो वो ध्यान में भी चले जाते थे। यदि कभी हमारी शोरगुल बढ़ी तो हम खुद ही एक दूसरे को चुप कराने में लग जाते, अंकल का ध्यान टूटा तो उनके गुस्से का शिकार कौन हो।

8 बजे तक ध्यान। फिर वो खाना बनाते और 9:30 तक तो निद्रादेवी उनपे सवार हो जाती। तो यदि आप 6:30 के बाद उनका दरवाजा खटखटायें  और दो बार में जवाब ना मिले तो समझ लीजिये की अंकल ध्यान में हैं। भइया दीदी अंकल के साथ नहीं रहते थे। जब कभी आते तो हमलोग का आना जाना होता था। अंकल से पापा की ही बातचीत होती थी। थोड़ी office की और थोड़ी ध्यान की। आधे अधूरा ज्ञान और भगवान् तो मिल भी गए होंगे अंकल को, आखिर 1 घंटे ध्यान में रहना आम बात है क्या।

लोगों का कहना था कि जब वो ध्यान में हों तो उन्हें कुछ सुनाई नहीं देता । और हम से तो 1 मिनट भी ना हो पाता था, आज भी नहीं होता । पापा भी यदि 2-3 दिन लगातार उनसे बाते कर लेते तो उनपर भी ये “ध्यान वाली बीमारी” आ जाती। हमारे तो मजे, 10-15 minute ही सही हम बिना शोर किये यदि कोई खेल मजा करना चाहे तो कर सकते थे।

अरे हाँ उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। मनहूस अंकल हमलोग के घर के अलावा कही नहीं जाते थे; तो कभी पापा से कह रहे थे|  Confession शब्द सही नहीं होगा और यथोचित शब्द मुझे मिल नहीं रहा सो मैं फ़िलहाल उनकी कहानी ही बता देती हूँ।

अंकल अपनी पत्नी के स्वर्गवास से पहले कहीं और posted थे। तो वो बता रहे थे कि पहले उनके table पर इतने रुपये आते थे कि वो उन्हें बिना गीने ही शाम में briefcase भर भर कर लाते थे।”मिश्रा जी इतना पैसा कि गिन ना पाएं, पैसों की बारिश होती थी।” पर ये सारा काला पैसा मिल के भी उनकी पत्नी को रोक ना पाया तो किस काम का ये पैसा । और फिर सब कुछ छोड़ कर वो यहाँ आगये। यहाँ वो एक ईमानदार क्लर्क थे।

हमारे लिए मनहूस अंकल जो कभी घर रंगवाते नहीं, कभी दीवाली पे दिए नहीं जलाते। और बड़े लोगो के लिए एक संत जो दिन दुनिया से ऊपर हो।

एक बात तो तय है कि वो aunty से बहुत प्यार करते थे। अभी हाल में फिर अपने बचपन के शहर जाना हुआ था, तो पता चला रिटायरमेंट के बाद वहां से चले गए|  उसके बाद की कोई खबर नहीं।

मेरे बचपन की यादों का एक टुकड़ा। मनहूस चौधरी अंकल…..नहीं, सिर्फ चौधरी अंकल !!!

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