शुभाशुभ दीवाली

और वो झट से अपना हाथ बढ़ा मेरे फ्रॉक में लगे आग को अपनी मुठी में बंद कर बुझा ली।… “मेरे मामा जी का दिया फ्रॉक जल गया”…उसकी हथेली भी तो….

शुभ दीपावली । आप सभी के जीवन में दीपों की रोशनी और मिठाइयों की मिठास हमेशा बनी रहे ।

इस दिवाली मैं अपनी बड़ी मौसी के यहाँ आई हूँ । यदि आप खुद से बहुत अधिक उम्र के व्यक्तियों के बीच हो तो आपकी स्वयं की उम्र चाहे कितनी भी हो आपको बच्चे होने का एहसास होगा। कम-स-कम इस उम्र तक तो मुझे यही लगता है। तो लग रहा है की 10-11 साल की रोहिणी अपनी माँ के साथ ही दीपावली मना रही हो – अपनी माँ के आगे पीछे घूमती और उत्साहित होती। दीयों में तेल भरना, बाती लगा थाली में सजाना । छत पे लगाने के लिए थाली में सजाते वक्त ना जाने कैसे एक दीया कहीं से मेरे फ्रॉक को छु लिया और वो झट से अपना हाथ बढ़ा मेरे फ्रॉक में लगे आग को अपनी मुट्ठी में बंद कर बुझा दी।… “मेरे मामा जी का दिया फ्रॉक जल गया……”…मुझे अपनी चीजें तब भी बहुत प्रिय होती थी खास कर तोहफे ! “मेरे मामा जी का…. “…. “चुप रहो” अपनी हथेली फूंकती हुई जब माँ ने डांटा…..नहीं हाथ की जलन के कारण थोड़ी ऊँची आवाज में कहा तो एहसास हुआ उसकी हथेली भी तो…. और फिर माँ को सुषमा की याद भी तो डरा गई होगी।

ऐसी ही एक दीपावाली की बात है । दिवाली के अगले दिन माँ और सुषमा की माँ, पापा और अंकल के ऑफिस निकल जाने के बाद हमारे घर पे स्वेटर बुनते बुनते बातें कर रही थी। ये उनका रोज का ही नियम सा था। हमलोगों की स्कूल की छुट्टी चल रही थी ।

घर पे अपनी बहनों को ना पाकर मैं सुषमा के घर उनको बुलाने गई। सुषमा उसकी एक बहन और दो भाई(सभी सुषमा से छोटे) और मेरी दो बहनें( मुझसे छोटी) पुराने दीयों में फिर से तेल भर के बिस्तर पर सजाये थे और दिवाली दिवाली खेल रहे थे। ” बिस्तर पे दीये ना लगाओ कपड़े में आग पकड़ सकता है टेबल पे सजा दो|” दूसरी कक्षा में थी तब तो, तभी इतनी समझ नहीं थी की आग तो टेबल से भी लग सकता है। ख़ैर मैं भी खेलने लगी। दीये जलाये , पूजा किया, खेल में ही । बच्चों को बड़ो की नक़ल करने में बहुत आनंद आता है। मुझे तो आज भी माँ की नक़ल करना अच्छा लगता है। शायद हर लड़की को उसकी माँ आदर्श लगती होगी और वो उस perfect lady की तरह दिखना और बनना चाहती होगी। मुझे मेरी माँ का reflex बहुत लुभाता है । किसी भी अचानक आई परिस्थिति में सही फैसले कर पाना, उनकी सभी खूबियों में से इस एक की नक़ल करने में मैं सबसे अधिक विफल रही हूँ।

खेलते खेलते अचानक हमने देखा की सुषमा अंदर के कमरे से रोती दौड़ती हुई आई …..पीछे आग की लपटें …. सुषमा जल रही थी। उसका फ्रॉक पीछे से पूरा जल रहा था। “चलो मम्मी के पास” कहती, मैं जल्दी से उसके घर का दरवाजा खोली। “मम्मी डांटेगी” सुषमा डर रही थी…..पर तब तक दरवाजा खुल चूका था। मैं दौड़ती हुई अपने घर आई पीछे सुषमा। हम दोनों के क्वार्टर में 10 फुट से भी कम की दुरी थी, पहली मंजिल पर सामने सामने ही रहते थे। उसकी मम्मी रोने चिल्लाने लगी । मेरी माँ ने तुरंत उसका जलता हुआ फ्रॉक फाड़ा।फिर आंटी उसको हॉस्पिटल ले गई। उसका पीठ जल गया था।

माँ ने तुरंत उसका जलता हुआ फ्रॉक फाड़ दिया।फिर आंटी उसको हॉस्पिटल ले गई। उसका सारा पीठ जल गया था। उसके हॉस्पिटल निकलने के बाद माँ ने कहा “उसको पानी टंकी में डाल देते तो अच्छा होता, बुरे वक़्त में दिमाग काम नहीं करता।” पर माँ का ऐसे समय में इतना भी करना बहुत हिम्मत की बात थी। कई महीनों तक वो हॉस्पिटल रही।

कॉलोनी में सब मुझे पूछते “क्या हुआ था?”…. “क्यों जला दी सुषमा को”…… “अब उसकी शादी कैसे होगी”….. “साड़ी भी नहीं पहन सकेगी कभी” स्कूल में भी सब कुछ न कुछ कहते।

वो स्कूल की एक लोती दोस्त थी। हम साथ स्कूल से लौटते। हाँ बहुत खास तो नहीं क्योंकि मैं माँ के साथ ही स्कूल के बाद का समय बिताती। पर स्कूल के लिए तो वही थी।

तब छोटी थी तो सोचती थी जब बड़ी हो जाउगी तो बहुत पैसे कमॉगी और उसका प्लास्टिक सर्जरी करवा दूँगी। फिर मेरी माँ तो उसकी जान बचाई थी तो लोग अच्छा क्यों नहीं देखते । किसी को माँ की बड़ाई करते तो नहीं सुनी।

महीनों बाद जब वो हॉस्पिटल से घर आई तो भी स्कूल नहीं जा सकती थी। मैं स्कूल की सारी पढाई लेके उसके घर उसे बताने गई तो उसकी दादी मुझे डॉट के भेज दी। बहुत रोइ थी मैं माँ के पास आ के “मैंने तो नहीं जलाया उसे। कोई समजता क्यों नहीं।”

ये तो बचपन की बाते हैं । हाँ सुषमा की शादी भी हो गई और उसके बच्चे भी हैं आज । मैं माँ के सूझबूझ, धैर्य , हिम्मत को बहुत याद करती हूँ और इसे अपने जीवन में अपनाने की कोशिश भी करती हूँ।

अब आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें और सावधानी रखें कि ऐसी हिम्मत देखने की आवश्यकता ही ना हो।

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