उसकी माँ

“उसकी माँ” हिंदी की एक कहानी जो उस दिन नीरजा पाण्डेय मैडम पढ़ा रही थी। कहानी तो मुझे याद नहीं क्योंकि मैडम पढ़ा तो “उसकी माँ” रही थी पर मेरी आँखों के आगे तो मेरी माँ की तस्वीर बन रही थी।

पता नहीं कि मैडम उस दिन माँ का विवरण इतना सूंदर कर रही थी या माँ होती ही है इतनी दिल के पास कि वो बाते दिल तक आ रही थी।

मैं अपना सर नीचे किये किताब को टकटकी लगाये देख रही थी। आँखें भर आई थी। मैं सर उठा के मैडम की ओर देख नहीं रही थी कि कहीं जरा भी छलके और मैडम ने देख लिया तो क्लास में एक नई ही कहानी पढना शुरु हो जायेगा।

पर जब चाहो कि ना देखे कोई तो कोई न कोई देख लेता है और अगर कभी ये चाहे कि कोई देखता और मनाता तो लाल लाल आँख लिए पुरे दिन घुमो कोई पूछेगा भी नहीं।

बगल की सीट से पूर्वी “रो रही हो रोहिणी” और जो इतनी मुश्किल से रोक रखा था वो बांध टूट गया।

मेरी मौसी उसी स्कूल में पढ़ाती थी, तो मैडम को पता था की मौसी की बहन और मेरी माँ नहीं थीं। दसवीं करने के बाद मैं अपनी मौसी के साथ रहने और वहीं आगे की पढाई करने आ गई थी। मैडम को तो ये मालूम था पर मेरे क्लास में किसी को ये पता नहीं था कि मेरी माँ नहीं है और मैं बताना चाहती भी नहीं थी।

“क्या हुआ रोहिणी, माँ नहीं मौसी तो है……” मैडम ने सारा भांडा भोर दिया।

फिर किसी ने कहा “जो बीत गई सो बात गई”

और मुझे ये सारी बाते कभी अच्छी नहीं लगती थी। दिल करता था चीख कर बोल दूँ तुम क्या जानो मैंने क्या खोया है और मेरे रोने का भी अधिकार ले लो मुझसे। अम्बर के पास तो कई तारे हैं एक टूट भी गया तो क्या गया उसका। तो ये बात बीत कर भी नहीं बीती ये तो हर रोज मेरे साथ रहती है।

 

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