Anita Roy

  • एक बार ब्रह्मकुमारी सिस्टर शिवानी को सामने से सुनने का मौक़ा मिला ।ऐसे तो tv पर उनकी बातें हमेशा अच्छी लगती थीं पर सामने से बात ही कुछ और थी।उस दिन जो उन्होंने कहा उन में से एक बात का मैं यहाँ ज़िक्र करन

    1. बात उन दिनों की है,जब मैं बारहवीं की परीक्षाएँ देकर इंजीनियरिंग के entrance एग्जाम की तैयारी कर रही थी।मैं दिन रात एक करके पढ़ाई में जुटी रहती थी।बस एक ही खयाल रहता कि किसी तरह IIT में मेरा selection हो जाए।उन्ही
  • यह एक सच्ची घटना है। मेरा उद्देश्य अन्धविश्वास फैलाना भी नहीं है न ही मेरा ऐसी बातों में विश्वास है। फिर भी मेरे साथ ऐसा कुछ घटा कि……

    हाल ही में मेरे ससुर जी की मृत्यु हुई थी। कुछ ही दिन पहले हम उनका

  • एक और वाकया याद आ रहा है। घटना 1997 की है जब वैभव 3 साल का रहा होगा। बाबा का बड़ा ही दुलारा था वैभव।क्या मजाल कि कोई वैभव को कुछ कह दे। हमेशा बाबा के साथ ही लगा रहता।कभी बाबा के साथ उनका पूरा सत्तू पी जाता और फिर

  • मोना मेरे देवर की बेटी है। जब उसका जन्म हुआ,मेरी बेटी 6 साल की थी। दोनों बेटे 8 और 10 साल के थे। घर में एक छोटे बच्चे के आने से सब की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
    जन्म से ही मोना काफी दुबली और कमज़ोर थी। रोती भी तो

  • हम दोनों बहनें…..
    साथ साथ बड़े हुए। हम साथ ही खेलते साथ पढ़ते और साथ ही सोते। लड़ाई झगड़े भी होते पर एक दूसरे के बगैर रह भी न पाते। हममे सवा साल का फर्क था।पढाई में भी एक क्लास का अंतर था फिर भी हमारे friends

  • तू कितनी अच्छी है तू कितनी भोली है प्यारी प्यारी है ओ माँ ओ माँ……

    ऐसा लगता है ये गाना हमलोगों की माँ के लिए ही लिखा गया होगा। कितना सटीक बैठता है माँ के लिए। 

    हम चारो भाई बहनों को माँ का एक समान प्यार

  • ‘ज़िन्दगी’ ज़िन्दगी बन गयी है। मैं हाल ही में शुरू हुए ज़िन्दगी channel की बात कर रही हूँ। आजकल ज्यादा समय इसी channel पर आ रहे serials को देखने में गुजरता है। बहुत पहले दूरदर्शन पर कभी कभी short stories पर बना serial कुछ इसी तरह का होता था।वैसे तो सभी serials अच्छे लग रहे हैं पर अभी ‘मेरे कातिल मेरे दिलदार ‘ काफी अच्छा लग रहा है।

    माहम और ओमर एक दुसरे से प्यार करते हैं। ओमर के घरवाले इस शादी से खुश नहीं हैं। काफी आरजू मिन्नतें करके ओमर अपने घरवालों को इस शादी के लिए राज़ी करता है। ओमर का बड़ा भाई बख्तियार भी अपने पिता से इस शादी की सिफारिश करता है। जबकि बख्तियार भी माहम को पसंद करता है। घर में एक बुआ हैं जो अपनी बेटी को ओमर की दुल्हन बनाना चाहती हैं। ऐसा हो नहीं पाया तो सारी कड़वाहट माहम पर निकालती हैं। माहम ऐसे माहौल में adjust करने की बहुत कोशिश करती है। पर घर में सभी उसके विरूद्ध हैं।

    ओमर को कुछ बताने की कोशिश करती है तो वो सुनना नहीं चाहता और उसे समझाता है कि बुआ की बात मानकर रहे और उनसे बहस ना करे। बख्तियार भी माहम को अकेला पाकर उसे परेशान करता है। माहम ओमर को बताना चाहते हुए भी बता नहीं पाती। आखिर एक दिन सब्र का बाँध टूटा और माहम ने बख्तियार पर इलज़ाम लगा ही दिया। ओमर को भी कहाँ बर्दाश्त होने वाला था। उसने माहम को उसी वक्त तलाक दे दिया।माहम अपने घर वापस जाती है। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी होती जाती हैं कि माहम को बख्तियार से शादी के अलावा और कोई रास्ता नहीं सूझता। वो शादी करके फिर से उसी घर में आती है। इस बार बख्तियार की बीवी बनकर।

    कहानी का अन्त तो पता नहीं क्या होगा लेकिन एक अच्छी भली मासूम लड़की किस तरह से villain बन रही है ये देखकर दुःख होता है। सवाल ये है कि अच्छे बनने से काम नहीं बना तो जीने के लिए बुरा ही बनना होगा क्या?

  • Anita Roy posted an update 3 years, 1 month ago

    I cannot see my new post zindagi which i have published today

  • आशापूर्णा देवी की लिखी ‘प्रथम प्रतिश्रुति’दुबारा पढ़ने का मौका मिला। एक बार तो काफी पहले पढ़ी थी शायद 20साल पहले। उस वक़्त कई बातों पर ध्यान नहीं गया। इस उपन्यास में सत्यवती का चरित्र ऐसा है कि पढ़कर आशचर्य होता है। उस वक्त एक नौ साल की लड़की का ऐसा सोच हो सकता है? आज के युग से तुलना करके देखें तो नौ क्या 19 साल की लड़की भी उस तरह से नहीं सोचती। छोटी सी उम्र में ससुराल जाने की बात अपने पिता से करना,फिर मायके आने का मौका मिलने पर भी बहन की शादी में न आने का निर्णय लेना जैसी कई छोटी छोटी बातें हैं जिससे कम उम्र में ही उसकी निर्णय  क्षमता का पता चलता है।

    आगे चलकर तो उसने काफी बड़े निर्णय भी लिए। उसका पति तो शायद घर से बाहर जाकर कभी नौकरी करने की नहीं सोचता अगर सत्यवती नहीं चाहती । दो बच्चों के साथ पति को लेकर कलकत्ता में नए सिरे से गृहस्थी शुरू की। बाद में एक बेटी भी हुई। दोनों बेटे तो स्कूल में पढ़ते थे बेटी को भी पढ़ाना चाहती थी की तभी बीमार ससुर की सेवा करने के लिए उसे गाँव जाकर करीब साल भर रहना पड़ा। बेटी सुवर्ण भी छोटी होने के कारण उसके साथ ही थी ।दादी से सुवर्ण का काफी मेलजोल बढ़ गया। ससुर की मृत्यु के बाद सत्यवती फिर से पति बच्चों के साथ कलकत्ता रहने लगी। 

    बड़े बेटे की शादी की बात चलने लगी थी। शादी तो गाँव से ही होनी थी। यही सारी बाते करने सुवर्ण के पिता गांव जा रहे थे कि सुवर्ण भी साथ जाने को मचल पड़ी। उनको गए काफी दिन हो गए तो सत्यवती को भी गांव आने की खबर आई। दोनों बेटों के साथ पहुचकर देखती क्या है की उसकी छोटी सी बेटी दुल्हन बनी हुई है। वह तो जैसे आसमान से गिरी। उसकी अपनी बेटी की शादी कर दी गयी और उसको पता तक नहीं। जिसके लिए उसने पढ़ने के सपने देखे थे। उसे लगा उसके पूरे जीवन की तपस्या मिटटी में मिल गयी है ।

     वह उलटे पांव लौट गयी काशी वास के लिए। किसी के सवालों का जवाब दिए बिना ही। पढ़के दुःख हुआ की किस उमंग से एक छोटी सी लड़की अपनी गृहस्थी शुरू करती है और उसको क्या मिला?कुछ भी तो नहीं हो पाया उसके मन का। काफी मोटी पुस्तक है।कुछ शब्दों में क्या कहा जा सकता है। पढने में अच्छा लगेगा ऐसा विशवास है।

     

     

  • Anita Roy changed their profile picture 3 years, 2 months ago

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