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  • हमारे यहाँ शादी एक बहुत बड़ा उत्सव है। हाल ही में एक शादी में जाने का मौका मिला ।अपने घर में भी दो शादियाँ की हैं। भतीजे की शादी थी और हम शादी वाले दिन ही पहुंचे थे। भैया का घर काफी बड़ा है जिससे लोगों को रहने की तो

  • राम बाबु का रिक्शा चल दिया ।अपने कमरे में लौटकर शारदा बचे हुए बेसन के लड्डू और मठरी को डब्बों में रखने लगी।
    जाते वक्त राम बाबु बहुत चुप से थे। शारदा की तरफ एक नजर डालकर ,बिलकुल सामने की ऒर देखते हुए रिक्शे पर बैठ गए।
    शारदा का मन पीछे बहुत पीछे आज से 25 -30 साल पहले चला गया।
    आज ससुराल में उसका पहला दिन था। राम वजह बेवजह उसके कमरे में आ जा रहे थे ,उसके आस पास मंडरा रहे थे। शायद सुंदर पत्नी पाकर खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहे थे।
    अपने में सिमटी नए परिवेश में खुद को जोडती शारदा भी खुश थी ।इस उम्र में ,खुश भी तो आदमी अनायास बिना किसी खास प्रयत्न के हो जाता है न।
    दिन इतनी तेजी से बीते की एक सप्ताह – प्यार मनुहार  में कब बीत गया कुछ पता ही ना चला।राम की छुट्टियाँ ख़त्म हो चली थी। कुल दस दिनों की ही तो छुट्टी थी। सुदूर देहात के किसी रेलवे स्टेशन पर असिस्टंट गार्ड की नौकरी। शारदा को मैके पहुंचाकर वो अपनी नौकरी पर चला गया।
    तीज त्योहारों मे व्यस्त ,कभी मैके कभी ससुराल आते जाते शारदा पांच वर्षों में तीन बच्चों की माँ बन गयी।इस बीच जितनी बार राम आये ,वो हर बार साथ ,उसके नौकरी वाले जगह जाना चाहती-लकिन कभी माता पिता से कैसे कहूं,ये संकोच घेर लेता,कभी छोटे बच्चों के जन्म और देखभाल की जिम्मेदारी का डर-राम शारदा को अपने साथ नहीं ल पाए।
    इन पांच सालों में शारदा ने अपने को बिलकुल अपने सास ससुर के रंग में ढाल लिया था।अपने शहरी रूप को भुलाकर ,ग्रामीण परिवेश में घुलमिल गई।
    देखते देखते बच्चे स्कूल जाने लायक हो गए। गाँव में रहना ठीक ना होगा ,बच्चों की पढ़ाई का सवाल। किन्तु राम की नौकरी भी तो बेहद छोटी गाँव नुमा छोटे स्टेशन पर लगी हुई थी। वहां भी बच्चों को ले जाना व्यर्थ ही था।। आखिर माता पिता की राय और आज्ञा लेकर गाँव के निकटतम शहर में किराये के मकान में ,शारदा तीनों बच्चों के साथ रहने लगी।
    राम बीच बीच में आते और शारदा से पत्नी का प्यार और अतिथि की अभ्यागत पाते रहे।
    गिने चुने तो छुट्टियों के दिन होते थे,इन में क्या अपनी कहों क्या उनकी सुनूं। इसी उधेड़बुन में शारदा लगी रहती। बच्चे भी संकोचवश ,राम से उतने खुलेपन से नहीं मिल पाते। बड़े दोनों लड़के तो कुछ पूछने पर ही जवाब देते थे,हाँ,छोटी बेटी मिनी जरूर अपने अबोध प्रश्नों से राम का मन बहलाया करती।
    अकेले बच्चों के साथ रहने पर शारदा को अक्सर  पड़ोसियों से काम लेना पड़ता,कभी बच्चों की बीमारी में डाक्टर बुलवाना है,तो कभी उनके लिए उचित मास्टर  रखवाना है।
    बिना पिता के घर में लड़के जल्दी ही बड़े हो जाते हैं। दरअसल पितृसत्तात्मक समाज में मर्द ही मुखिया माने जाते हैं ना। बड़ा बीटा महेंद्र जल्द ही करता धर्ता बन गया घर का। और जबसे नजदीकी फैक्ट्री में उसकी नौकरी लगी वह अपने को सर्वेसर्वा ही समझने लगा।
    शारदा अब अपने दोनों बेटों की शादी का स्वप्न देखने लगी।
    समय के साथ साथ उसकी धुरी भी बदल गई। चारों ओर चक्कर काटना तो उसका चलते ही रहा किन्तु केंद्र पति से हटकर तीनों बच्चे हो गए।
    अकेले परिवार के झमेलों से जूझते जूझते स्वाभाव में एक कटुता आ गयी। राम आते और अपनी पुरानी प्रेयसी पत्नी को ढूँढ़ते ही रह जाते।
    शारदा अपने परेशानियो को राम के समक्ष रखती तो वो ऐसे हल सुझाते जो बिलकुल अव्यह्वारिक  होते वो तो फिर भी अपने पति से जुडी थी,बच्चों के लिए तो वे एकदम मेहमानों की श्रेणी में पहुँच गए थे।मुहं लगी मिनी भी यौवन के पदार्पण के बाद पिता से कट सी गई थी।
    ।और फिर राम बाबु पूर्ण अवकाश पाकर घर लौट आये। इन 25-30 सालों में उन्होंने जो कमाया घर और घरवालों पर ही न्योछावर किया- लेकिन मन के तार जुड़ नहीं पाए। शारदा भी अब बुढ़ापे में पहुँच चुकी थी,पहले वाली कर्मठता और स्वभाव का लचीलापन नहीं रहा। अपने ही घर में राम इतने उपेक्षित महसूस करने लगे कि प्राइवेट में नौकरी लगते ही वापस चल दिए। चलते चलते शारदा से भी चलने को कहा था।
    आज अपने कमरे में बैठी शारदा  पिछला सब जैसे आँखों में घटता हुआ देख रही थी। समय के साथ शारदा बदल गयी लकिन राम नहीं बदल पाए। दरअसल शारदा ही तो सफल रही जिंदगी में। चलते रहना ही तो जिंदगी है ना।
    हो सकता है वापसी के पाठकों की सहानुभूति राम बाबु के तरफ हो। मेरी भी थी। लकिन क्या सत्य ही वे उतने सहानुभूति के हक़दार हैं। शारदा तो शुरू से ही जीवन में समझौते करती रही। अब जीवन संध्या में पुनः नए सिरे से बच्चों से कटकर,पति से जुड़ना क्या  संभव होगा।क्या जिंदगी में उसकेलिए कहीं ठहराव,कहीं पड़ाव नहीं है। यदि उसने अपना मन मठरी और लड्डुओं में ही रमा लिया तो-इस में अनहोनी क्या है?आखिर अपने जवानी के दिन -पति वियोग के, भी तो इन्ही के सहारे बिताया था।।

  •     बहुत तरह के विचार मेरे मन में आते रहते हैं। सभी कुछ तथ्य वाले ही हो जरूरी नहीं हैं। खामखा भी बहुत कुछ सोचते रहते हैं।

    जैसे हम सोचते हैं -एक सोने का हार हो हमारे पास’और वैसा ही चाँदी का सोने की पोलिश

  •         अक्सर healthy criticism की बात सुनते हैं।

    प्रायः हम सामने वाले की आलोचना करते रहते हैं-उसके मुह पर भी। ये कहते हुए की अगर कहा न गया तो,सुधार नहीं होगा ।लेकिन क्या किसी व्यक्ति को ऐसा कुछ बताया जा सकता

  •      कुछ दिन पहले टीवी पर एक प्रोग्राम आता था,सच से सामना। कई तरह के प्रश्न होते थे,लेकिन अंतिम कुछ प्रश्न एकदम निजि,और अधिकांशतः sexual सम्बन्ध से जुडी हुई। अलग अलग लोगों ने अपनी राय दी,ज्यादातर नकारात्मक। लेकिन

  •     अपेक्षायें……….
    जिंदगी में,रिश्तों से-हमारी कितनी अपेक्षाएँ रहती हैं।

    दरअसल हम एक मूरत गढ़ लेते हैं मन में-पति को ऐसा होना चाहिए बच्चे को ऐसा होना चाहिए। फिर आगे चलकर जब वास्तव में वो सम्बन्ध बनते

  •        ego problems क्या है?

    हम अक्सर ego को self respect से जोड़ लेते हैं। लेकिन ऐसा होता है नहीं। ego एक ऐसा attachment है जो की हमारे ही बनाये एक false image से होता है।

    इसमें पड़कर हम दो तरह से व्यवहार

  •       जिंदगी ना मिलेगी दोबारा ,का एक दृश्य था-अभय ,कटरीना को गोद में उठाये हुए था ,उसी समय उसकी मंगेतर आ जाती है।
    ऐसा क्यों होता है?हम अपने साथी के नहीं रहने पर free महसूस करते हैं क्या?मन में कोई पाप ना रहते हुए

  •      बात थोड़ी पुरानी है।
    english vinglish देखे…..साधारण से जीवन की साधारण कहानी।

    श्रीदेवी के चरित्र से खुद को जोड़ पाए-situation चाहे अलग हों-लकिन ये जो एक sensitive महिला की जिंदगी है-अपने पति,बच्चों अथवा

  • प्रायः स्त्री अपने पति या बड़े होते बच्चों के आगे पीछे उनके आदेश मानते हुए दौड़ती रहती हैं। कोई ऐसा कम जो कहा गया हो, छूट न जाये। कहीं ऐसी जगह न जाएँ जहाँ मना किया गया हो।
          मैं स्वयं भी अक्सर यही करती हूँ कभी

  • विद्रोह या विरोध एक तरह से एंटीबायोटिक के तरह ही काम करता है।

           यदि आपको किसी से किसी प्रकार का विरोध प्रकट करना है तो,एक खास dose में ही करना पड़ेगा।        थोडा बहुत चिल्लाचिल्ली कर लिए और फिर पुराणी शैली

  • वंश परंपरा एवं वारिस की कैसी हास्यास्पद श्रंखला है महाभारत में।

    शांतनु का भरत वंश- उसके भीष्म और चित्रांगद,विचित्रवीर्य तीन पुत्र हुए। वंश परंपरा तो इन्ही तीनों से बढ़ सकती थी। किन्तु भीष्म रहे अविवाहित,और चित्रांगद मारा गया युद्ध में।

    विचित्रवीर्य की दो पत्निया-अम्बा और अम्बालिका ।किन्तु संतान होने से पूर्व हि
    विचित्रविर्य की मृत्यु हो गई।

    अब शांतनु की पत्नी सत्यवती की विवाह पुर्व हुई संतान व्यास मुनि से अम्बा,अम्बालिका को पुत्र प्राप्ति।
    तो ध्रितराष्ट्र और पांडू में कहीं से भी भरतवंश का खून दौड़ने की सम्भावना है। कतई नहीं,फिर भी वे भारतवंशी ही कहलाये। क्या विडम्बना है?

    पूरा महाभारत ही ऐसे उलजलूल रिश्तों से भरा है।
    आगे चलकर तो और मजेदार। फिर पांडू अपनी संतान उत्त्पत्ति में अक्षम,तो कुंती और माद्री ने तथाकथित देवताओं से संपर्क किया एवं पाँचों पांडवों का जन्म हुआ।

    और देखिये—ये भी भरतवंशी ही कहलाये।

    इतना गोलमाल —शायद ही किसी परिवार में रहा हो।
    और हम अब भी टी वी सीरियल को दोष देते हैं की बहुत बेतुकी कहानियां होती हैं —।

     

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