मोना

मोना मेरे देवर की बेटी है। जब उसका जन्म हुआ,मेरी बेटी 6 साल की थी। दोनों बेटे 8 और 10 साल के थे। घर में एक छोटे बच्चे के आने से सब की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
जन्म से ही मोना काफी दुबली और कमज़ोर थी। रोती भी तो दूसरे कमरे तक आवाज़ न जाती।फिर भी दादी की मालिश और मेरी निगरानी में वो जल्दी ही गोद में लेके खेलने लायक हो गई। मेरे बच्चे स्कूल से आते ही उसे गोद में लेने की जिद करने लगते। उन दिनों यही उनका खेल हो गया था। मोना नाम भी मेरे बेटे ने ही रखा था। दिन भर का ज्यादा समय उसका मेरी गोद में ही बीतता। दूध पिलाने के आलावा बाकी समय हम ही उसको लिए रहते।

समय बीतता रहा। मोना 10 महीने की थी जब हमने बच्चों के साथ चक्रधरपुर जाकर रहने का फैसला किया। मेरे पति की पोस्टिंग उन दिनों वहीँ थी।मोना को छोड़कर जाते हुए हम सब को बहुत बुरा लग रहा था। फिर भी जाना तो था। छुट्टियों में हम आते रहे और मोना को हम सबका प्यार मिलता रहा। हम जब वापस जाने लगते तो मोना बहुत रोती। हमारे साथ जाने की जिद भी करती थी। पर हमको इतनी छोटी बच्ची को माँ से अलग करना अच्छा नहीं लगता था। फिर उसकी माँ भी तो अकेली हो जाती।

मोना तीन साल की हो गयी तो उसके भाई का जन्म हुआ। उस बार जाड़े की छुट्टियों में भी हम घर गए थे। नए बच्चे को भी देखना था। मोना के मम्मी पापा की भी इच्छा थी कि मोना भी मेरे बच्चों के साथ पढ़े और मेरी निगरानी में रहे। अब तो घर में भी एक और बच्चा आ चुका था तो मोना को ले जाने में कोई बुराई नज़र नहीं आया। सबकी इच्छा भी थी। मोना ख़ुशी ख़ुशी हमारे साथ चल पड़ी। वो हमको बड़ी माँ बुलाती थी। पर वहां जाने के बाद सबकी देखादेखी वो हमको माँ ही बुलाने लगी।

मोना को हमसे शिकायत रहती कि हम सबको  uniform पहनाकर स्कूल भेज देते हैं और उसको घर में ही रखते हैं। फिर समय आया स्कूल में admission का।अच्छी तरह समझा बुझाकर ले गए पर इतना बोलने वाली मोना interview में बिलकुल चुप हो गयी। उस बार उसका admission नहीं हो पाया। अगले 6 महीने उसको interview के लिए तैयार करते रहे। इस बार carmel school में interview दिलवाए। एक बड़े ball का लालच भी उसको दिया गया था। इस बार उसका एडमिशन हो गया।

अब रोज सुबह तैयार करवाना और स्कूल पहुचाना मेरा काम हो गया था। सुबह सब्जी लाने भी हमको ही जाना होता था। सुबह उसको नहलाकर हम सब्जी लाने जाते और लौटने तक वो जूते पहनकर कंघी करके तैयार रहती। फिर उसका हाथ पकड़कर हम लगभग दौड़ाते हुए उसको school ले जाते। छुट्टी के वक्त बड़ा बेटा उसको लेते हुए घर आता। वहां उसकी पढ़ाई दो साल हो पाई। इनकी बदली होने से हमसब वापस घर ही आ गए।

बड़ा बेटा तब तक कॉलेज में पढ़ने लगा।बाकी तीनो का admission st xaviers school में हो गया। वहां भी मोना मेरे साथ ही सोती मेरे पास ही पढ़ती। class 3 तक की पढाई वहीँ हुई मोना की। तब तक मेरे बच्चे बड़े हो चुके थे। सबको आगे की पढाई coaching वगैरह के लिए पटना रखने का विचार हुआ। मोना कहाँ पीछे रहने वाली थी। वो भी हमारे साथ पटना आ गयी। मेरी बेटी का admission 11th में DAV में हो गया। मोना का st alberts में। क्लास में1st आने का सिलसिला उसका यहाँ भी जारी रहा।कभी कभी ही 2nd हुई होगी।

10th में अच्छे marks लेकर पास हुई और फिर BSEB DAV में commerce में admission हुआ। अब वो थोड़ी बड़ी और समझदार भी हो गयी थी। मेरे तीनो बच्चे बाहर जा चुके थे।हम और मोना ही रह गए थे घर में। कभी रात को खाना बनाने का मन नहीं होता तो मोना हम दो लोगों का रोटी और भुजिया बना लेती। कभी मेरी तबीयत खराब होती तो मोना होती देखभाल करने के लिए। उसको हमसे बड़ा लगाव हो गया था। आगे वह law की पढ़ाई करना चाहती थी। लेकिन पहली बार के प्रयास मे कहीं हो नहीं पाया।एक साल Patna women’s College में B.com की पढ़ाई करती रही साथ ही comp की तैयारी भी करती रही। अगली बार बैंगलोर के एक gov कॉलेज में उसका admission हो गया। इधर शादी करके बेटी विदा हुई उधर मोना भी बैंगलोर के लिए निकल गयी। सच पूछा जाय तो मोना का जाना ही ज्यादा अखरा क्योंकि इतने सालों में वो पहली बार हमसे अलग हुई थी। बेटी तो सालों पहले से engineering की पढ़ाई के समय से ही घर से बाहर ही रह रही थी।

वहां जाकर भी मोना top करती रही है ।हर साल ढेर सारी trophy लेकर आती है। छुट्टियों में आती है तो ऐसे घर के कामों में जुट जाती है जैसे कभी गई ही न हो यहीं रहती हो। हम सबकी वो छोटी सी मोना कब बड़ों की तरह बातें करने लगी पता ही नहीं चला। मेरी आवाज़ से ही वह फ़ोन पर भी पहचान लेती है कि हम बीमार हैं परेशान हैं या खुश हैं। उससे अब अपनी problems भी share कर लेते हैं। हमेशा कहती है माँ आप चिंता मत करिए हम हैं न। सब ठीक हो जाएगा। इस बार दिवाली में वो घर नहीं आ रही है। बड़ा सूना लगेगा। हमेशा ऐसीे ही रहे  कहीं रहे ऐसे ही भावनात्मक रूप सेे जुड़ी रहे। खूब पढ़ाई करे तरक्की करे यही कामना है।

और अंत में वो गाना याद आता है…..

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई..
जाने तू या जाने ना माने तू या माने ना…..

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