यादों में नानी घर

दशहरा आ रहा है।

जब छोटे थे, हमलोग भागलपुर जाया करते थे पूजा में, नानी के घर। भागलपुर – गंगा के दक्षिणी तट पर बसा बिहार का एक शहर |

बीच वाले कमरे की महक आज भी ताजा है-खिड़की पर आईना छोटा सा -दिवार शायद 15 इंच से भी मोटी थी-कमरा एकदम ठंडा रहता था और अँधेरा भी–खिड़की के पास एक संदूकनुमा बक्सा था जिसपर बैठकर हमलोग बाल बनाया करते थे। वहाँ की सीलन,तेल चीकट की अजीब सी मिली जुली महक—-।काला पड़ गया खिड़की के पास का प्लास्टर। फिर उसी कमरे के दरवाजे पर लटकता हुआ ताला–लगा हुआ तो देखे नहीं कभी,हाँ कड़ी में झूलता रहता था-वही पुराने ज़माने का अलीगढ़ी ताला–लेकिन बहुत बड़ा ,शायद दो ढाई किलो से कम ना होगा।

बगल का कमरा भगवती घर था। वो तो और ठंडा और अँधेरा। मिटटी से लीपा पोता काफी बड़ा-क्या कहते थे याद नहीं–शायद देवी की पीढ़ी या ऐसा ही कुछ। एक बड़ा सा संदूक उसमे भी था जिसमे अस्त्र शस्त्र थे। तलवार गड़ासा इत्यादि..पूजा में बलि प्रदान जो होता था। आँगन में मल्काठ लगा रहता था,शायद सालों भर वो गडा ही रहता,लकड़ी का बना हुआ। राघवेन्द्र मामा बड़े सुंदर थे ;अब,लगता है –उस समय नहीं–थोड़े सनकी –थोड़े बडबोले थे इसलिए। तलवार को धार करना पत्थर पर–फिर लगातार तीन या चार पाठा की बलि देना। फिर उस खून से पुरुषों को तिलक लगाया जाता और हम बच्चों के गले पर टीका।

नाना मेरे ,खडाऊ पहना करते,लकड़ी का बना हुआ,अंगूठे से balance करता हुआ। उजली सफ़ेद धोती –उनकी खुद की धोयी हुई–नील टिनोपाल–लगा हुआ और साथ में बाँह वाली सफ़ेद गंजी। दुबले पतले लेकिन भक से क्रोधित होने वाले।

और नानी–छोटे कद की खूब गोरी–एकदम सफ़ेद बाल–और उसमे पूरे माँग में ढेर सारा सिन्दूर। साडी के प्लेट्स को अन्दर नहीं खोंस कर —बहार गुच्छे में लटकता रहता था। शायद उनके समय का वही stlyle था।

बहुत बातें हैं–कितना लिखूँ?

थोड़े बड़े होने पर,नहीं उससे पहले–बाबूजी जब थे–सबलोग पूजा में मूर्ति दर्शन को निकलते–रिक्शा के काफिले में–।मामा मामी,मौसा मौसी–और हम सारे cousins–sandis compound की ओर–बहुत बड़ा मेल लगता था।

बाद के बरसों में–जाते तो थे,लकिन —

मन धीरे धीरे टूट रहा था–

मामा माँ को कंजूस कहा करते,अब सोचती हूँ की शायद वो भाई बहन की सामान्य छेढ़छाढ़ ही हो। लेकिन उस समय—जरा भी अच्छा नहीं लगता हमको।

धीरे धीरे हम बड़े होते गए और भागलपुर जाना घटता गया—

नाना नानी सिर्फ यादों में ही रह गए—-

 

 

 

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