निर्भया को कभी इन्साफ नहीं मिलेगा


आज बहुत दिनों बाद एक पुराने दोस्त से बात हुई। कुछ टूटा सा था पहले, तो शिकवे शिकायत करने के बाद विदेश ने पूछा – अच्छा याद करती हो मुझे?
– हाँ क्यूँ ना, मेमोरी बहुत तेज है मेरी।
– कब?

मैंने उसे तो कुछ इधर उधर का सुना दिया।

फिर फ़ोन रखने के बाद सोचने लगी। कब कितना का हिसाब तो कभी किया ही नहीं। और केवल वो ही नहीं था यादो में।

एक सुबह मैं ट्यूशन के लिए 1/2 घंटा पहले ही निकल गई केमिस्ट्री की कुछ टॉपिक मैं अलग से समझना चाहती थी। अभी सूर्योदय नहीं हुआ था। जनवरी की ठंड में सड़क पे कुहरा छाया था। वो पूरा शहर चिर परिचित था इसलिए सन्नाटा होने के बावजूद किसी तरह का कोई डर तो था नहीं। मैं अकेली चली जा रही थी। ट्यूशन के लिए एक छोटा रास्ता हॉस्पिटल कैम्पस से होते हुए जाता था । एक पतली पगडण्डी, जिसके एक ओर छोटा पहाड़ी टीला और दूसरी ओर गहराता जंगल और आगे बढ़ने पे खंडहर में तपदिल हुआ एक सरकारी क्वार्टर; उससे थोड़ा आगे ट्यूशन वाले भईया का घर।

हॉस्पिटल के कैंपस में एक स्कूल ड्रेस पहने मोफलर लगाये लड़का खड़ा था। किसी का इंतजार कर रहा था शायद। मैं आगे बढ़ती चली। थोड़ी देर बाद लगा की कोई पीछे चल रहा है। मैंने अपनी गति तेज की तो पीछे के कदम भी तेज होते गये । अब थोड़ा डर भी लगने लगा। पर केदला में!.. पापा को सब जानते थे कभी कुछ…वैसे सुषमा की मम्मी(मेरी Part-mother… कॉलोनी की aunties को मैं अपनी पार्ट टाइम मदर कहती हूँ ,माँ के बाद मुझे बुला के कुछ कुछ सिखाती पढ़ाती रहती थी) ने एक बार कुछ कहा तो था अकेले नहीं घूमना, वगैरा वगैरा।

बहुत कुछ चलने लगा दिल में और उसी गति से मेरे पैर भी। अचानक वो लड़का मेरे आगे और कुछ समझने से पहले उसका एक हाथ मेरे कंधे पे मेरे स्वेटर से पिन की हुई चुन्नी को मुठी में पकड़े। साँस और मेरी आवाज दोनों हलक में फँसे हुए। सर उठाया तो उसका दूसरा हाथ ऊपर उठा हुआ था। मैं अपनी एक हाथ की छोटी मुट्ठी से उसके कंधे पे मारती और दूसरे हाथ मोफलर हटाने के लिए बढ़ाया ताकि उसका चेहरा देख सकूं । वो अपने दूसरे हाथ से तब तक मेरी नाक को चोटिल कर चुका था । इधर मैं भी उसका मोफलर हटा एक झलक देखी ही थी की वो फिर से मोफलर खीच कर अपना चेहरा छुपाता भागने लगा।

मैं आगे बढ़ी भईया के घर की ओर, अब मैं जेम्स बांड तो थी नहीं कि पीछा करती। दूसरे तीसरे कदम पे अहसास हुआ की नाक से खून टपका । अपने चुल्लु में खून को रोकती और फेकती। कुछ कदम पे खंडहर वाला क्वार्टर आया तो इस कल्पना पर कि क्या वो सिर्फ मेरी नाक भर तोड़ने आया था या… और अपनी पहचान खुलने के भय से भाग गया, मैं रोई और अपनी साड़ी बची खुची ताकत को समेट कर जोर से चिल्लाई “भईया…. भईया..” भईया का घर भी नजर आने लगा। नाक से टपकते खून को देख कुत्ते भौकने लगे। मेरी आवाज और कुत्तो का भौकना सुन कर भईया आये, छोटे भईया को आवाज दिया।

की भगेल; क्या हुआ…बहुत मुश्किल से “मारा….भाग गया… ” कहती हुई पीछे रास्ते की ओर हाथ दिखाई तो छोटे भईया उस और भागे। अब वो मिलना तो था नहीं ये तो मैं उसी समय समझ गई थी। पर उस वक़्त रोना चाहती थी। भईया मुझे अंदर लाए, आंटी, भाभी मुझे बिछावन पे लेटाई। “माँ न हथीन तो कोई कुछो करे” कुछ था ऑन्टी ने मैथिली में कहा जिसका भाव यही था की मेरी मम्मी के नहीं होने के कारण वो मुझे कमजोर जान हमला किया था। मेरी नाक की चोट से भी अधिक तकलीफ तो इस बात से हुई।

उस दिन का सभी ट्यूशन क्लास कैंसल । विदेश, शैलेन्द्र, छोटू को बिना कुछ कहे लौटा दिया गया , आरती को रोक लिया गया …अब मैं अकेले तो स्कूल नहीं जाती ना… नाक जो टूट गई थी।

लड़को को आधी अधूरी बात ही पता चली थी और साथ ही पूरी क्लास को भी, तो मेरे स्कूल पहुँचते ही सवाल जवाब। मैंने एक दो वाक्य में साराँश बता दिया। विदेश उत्तेजित होता बोला ..कौन था स्कूल का था पहचान लो बस। ये जानते हुए भी की उसके बस का कुछ था नहीं , उसका उत्तेजित होना मेरी सुरक्षा के लिए, अच्छा लगा मुझे।

ऑन्टी भी दूसरे दिन चाकू शॉल में छुपाये ट्यूशन के राश्ते पे खड़ी थी। उस दिन से पापा या भाई मुझे ट्यूशन या कहीं और भी यदि मुझे जाना हो तो छोड़ने और लेने जाते। कॉलोनी में भी अगर किसी के घर जाना हो तो पापा बहन को साथ ले जाने कहते। अगर भाई कही जाने में आनाकानी करता तो पापा से कह देती अकेले चली जाऊंगी मुझे कौन जनता है कुछ हुआ तो आपको ही जानते हैं सब, मेरी क्या हस्ति। सिर्फ मिश्रा जी की बेटी उससे अधिक तो कुछ थी भी नहीं मैं।

3 दिन बाद पहचान भी ली उस लड़के को। इंग्लिश की नई ट्यूशन लगवा दी थी पापा ने। कॉलोनी से एक और लड़की जाती थी तो ले जाने लाने की चिंता नहीं होती और वो भईया के घर के पास भी था और उस ट्यूशन से पहले। इंग्लिश के बाद भईया के घर और उसके बाद स्कूल।

इंग्लिश ट्यूशन का दूसरा ही दिन था, मैं भईया के घर के लिए निकलने ही वाली थी की एक लड़का आ के बैठा ठीक मेरे सामने। कॉपी बंद कर अपने बैग में डालते हुए सर उठाया तो जैसे साँप सूंघ गया। वो सामने था मेरे, वो चेहरा उतनी ही दुरी पर जितना उस दिन था, वो आँख मुझे घूरती और फिर उसी तरह मोफलर से उसने चेहरा छुपा लिया। “रोहिणी चलो” इंदु बोली तो मैं अपना बैग ले के भईया के घर। ट्यूशन के बाद भईया को बोली..”मैंने उस लड़के को देखा”

बात प्रिंसिपल तक गई। उसी दिन इंग्लिश के सर मुझे बुला के बोले कि वो मेरा भ्रम भी तो हो सकता था और फिर मैंने काला लड़का कहा था वो तो साँवला था।

सर वही था, मुझे मेरा भाई रोहित ही काला लगता है और वो तो उससे भी काला था।

मुझसे यूँ सवाल किया जा रहा था कि मैं ही गुनहगार हूँ।

फिर बाद में पापा ने भी समझाया कैसे वो कुछ नहीं कर सकते वो minority था। और उसका और उसके घर वालो का कहना था कि वो 4 दिन से बीमार था उस दिन वो ट्यूशन के लिए घर से निकला तो था पर तबियत ख़राब होने के कारण आधे रास्ते से ही घर लौट गया।
और फिर उसकी एक बेटी भी थी। वो नौवीं में ही साथ पर दूसरे सेक्शन में।

क्या उसकी बेटी थी या वो minority था से वो बेगुनाह हो जाता है। और ये की वो भी घर से निकला था पर ट्यूशन गए बिना ही लौट गया। क्यों किसी को वो नहीं दीखता जो मुझे दिख रहा था।

मेरे पापा जो अगर लेबर कॉलोनी वालों के बिजली ख़राब (मूर्खो को समझ नहीं आता था बिजली झगड़े से नहीं मशीनो से चलती है और ठीक होने में वक़्त तो लगता है) का हल्ला करते लाठी डंडा ले के आने पे भी शेर की तरह दहाड़ते खाली हाथ ही निकल जाते थे। और वो सब शांत हो कर हमारे घर के आगे से चले जाते। वो ये माइनॉरिटी वाली बाते कर रहे थे। वो लोग दंगा वंगा करेगा। लड़की है …इस chapter को close कर दो… मैं तो बेटी नहीं थी वही तो कहते थे मैं पापा की बेटा से ज्यादा हूँ। पापा भी मजबूर हो सकते हैं कभी सोचा ना था।

ये जिंदगी का दूसरा सबक था माँ के जाने के बाद । वो लड़का बेख़ौफ़ मुझे स्कूल के कॉरिडोर में घूरता और शायद कहता क्या कर लिया तुमने मेरा। दूसरे दिन बहुत तेज बुखार में मैं बड़बड़ा रही थी कुछ तो पापा घबरा के बगल से नेता अंकल को बुला लाये। नेता अंकल शायद लेबर यूनियन के नेता थे । फिर अंकल मुझे कह रहे थे की वो मुझे कुछ नहीं कर पायेगा । वो लोग हैं ना।

पर मैं जो उनसे कहना चाहती थी वो ये कि वो लोग भी उसका कुछ कर तो नहीं सके। वो तो फिर भी मेरी नाक तोड़ गया।

जैसे आप स्कूल में फ़ी दे कर कुछ सबक सीखते हैं वैसे ही कुछ सबक पसीना दे कर और कुछ खून।

ऐसा ही कुछ निर्भया के साथ भी है, बेसक उसकी तकलीफ और दर्द को मैं कल्पना तक में सह ना सकूँगी, पर कोई कुछ नहीं कर सकता सबके हाथ बंधे हैं।

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