बंदिश तोड़ती नायिकाएँ- अकेले चलना नियति ?

Outlook magazine में एक लेख पढ़े-बंदिश तोड़ती नायिकाएँ……..

यानि ऐसी फ़िल्में,जिनमे नायिकाएँ लीक से हटकर एक खास स्थान पाती हैं,अपने स्वयं को जाहिर करती हैं।

फिल्मों में–मृत्युदण्ड,गाइड,भूमिका,अर्थ,अस्तित्व,दामिनी…..वगैरह वगैरह…. थीं। फिल्म सभी अच्छी और प्रायः मेरी देखी हुई थी। देखते वक्त नायिका के निर्णय एवं साहस के हम कायल भी रहे हैं। मेरा मानना रहा है की अपनी एक दृढ़ सोच तो होनी ही चाहिए; ये अलग बात है की क्रिया रूप में हम ना ला पाते हों,लकिन मन में रहता है इसमें दो राय नहीं।

मगर आज नाम पढ़ते पढ़ते फिल्मों के अंत पर भी मेरा ध्यान गया। लगभग सभी के अंत में स्त्री की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है —वो अपना दो टूक फैसला सुनाती है,और फिर जिंदगी अकेले जीने का निर्णय लेती है।

क्या एक स्वतंत्र सॊच रखने वाली,अपने भावनाओं को व्यक्त करने वाली स्त्री की नियति अकेले चलना ही है?
जहाँ अपना स्व दिखाया,पुरुष साथी कुम्हलाया….

शायद जीवन पर्यन्त पुरुष एक भुलावे में ही जीना चाहता है। मेरी स्त्री संगिनी की एक स्वतंत्र सोच और व्यक्तित्व हो सकती है ,ऐसी कल्पना ही नहीं कर पाते हैं,देखकर पचा नहीं पाते हैं-फिर उसके साथ घर गृहस्ती नहीं कर पाते हैं।

एक इकाई को स्वीकार नहीं कर पाते हैं….शायद,सिर्फ परछाई ही चाहते हैं।

समय बदल तो रहा है,लकिन मंजिल अभी दूर है।

वरना अभी भी queen नहीं बनती।

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