प्रथम प्रतिश्रुति

  • आशापूर्णा देवी की लिखी ‘प्रथम प्रतिश्रुति’दुबारा पढ़ने का मौका मिला। एक बार तो काफी पहले पढ़ी थी शायद 20साल पहले। उस वक़्त कई बातों पर ध्यान नहीं गया। इस उपन्यास में सत्यवती का चरित्र ऐसा है कि पढ़कर आशचर्य होता है। उस वक्त एक नौ साल की लड़की का ऐसा सोच हो सकता है? आज के युग से तुलना करके देखें तो नौ क्या 19 साल की लड़की भी उस तरह से नहीं सोचती। छोटी सी उम्र में ससुराल जाने की बात अपने पिता से करना,फिर मायके आने का मौका मिलने पर भी बहन की शादी में न आने का निर्णय लेना जैसी कई छोटी छोटी बातें हैं जिससे कम उम्र में ही उसकी निर्णय  क्षमता का पता चलता है।
  • आगे चलकर तो उसने काफी बड़े निर्णय भी लिए। उसका पति तो शायद घर से बाहर जाकर कभी नौकरी करने की नहीं सोचता अगर सत्यवती नहीं चाहती । दो बच्चों के साथ पति को लेकर कलकत्ता में नए सिरे से गृहस्थी शुरू की। बाद में एक बेटी भी हुई। दोनों बेटे तो स्कूल में पढ़ते थे बेटी को भी पढ़ाना चाहती थी की तभी बीमार ससुर की सेवा करने के लिए उसे गाँव जाकर करीब साल भर रहना पड़ा। बेटी सुवर्ण भी छोटी होने के कारण उसके साथ ही थी ।दादी से सुवर्ण का काफी मेलजोल बढ़ गया। ससुर की मृत्यु के बाद सत्यवती फिर से पति बच्चों के साथ कलकत्ता रहने लगी। 
  • बड़े बेटे की शादी की बात चलने लगी थी। शादी तो गाँव से ही होनी थी। यही सारी बाते करने सुवर्ण के पिता गांव जा रहे थे कि सुवर्ण भी साथ जाने को मचल पड़ी। उनको गए काफी दिन हो गए तो सत्यवती को भी गांव आने की खबर आई। दोनों बेटों के साथ पहुचकर देखती क्या है की उसकी छोटी सी बेटी दुल्हन बनी हुई है। वह तो जैसे आसमान से गिरी। उसकी अपनी बेटी की शादी कर दी गयी और उसको पता तक नहीं। जिसके लिए उसने पढ़ने के सपने देखे थे। उसे लगा उसके पूरे जीवन की तपस्या मिटटी में मिल गयी है ।
  •  वह उलटे पांव लौट गयी काशी वास के लिए। किसी के सवालों का जवाब दिए बिना ही। पढ़के दुःख हुआ की किस उमंग से एक छोटी सी लड़की अपनी गृहस्थी शुरू करती है और उसको क्या मिला?कुछ भी तो नहीं हो पाया उसके मन का। काफी मोटी पुस्तक है।कुछ शब्दों में क्या कहा जा सकता है। पढने में अच्छा लगेगा ऐसा विशवास है।

 

 

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