बच्चे मन के सच्चे

एक और वाकया याद आ रहा है। घटना 1997 की है जब वैभव 3 साल का रहा होगा। बाबा का बड़ा ही दुलारा था वैभव।क्या मजाल कि कोई वैभव को कुछ कह दे। हमेशा बाबा के साथ ही लगा रहता।कभी बाबा के साथ उनका पूरा सत्तू पी जाता और फिर दिन भर न तो दूध पीता और न ही कुछ खाता। कभी बाबा के खाने में से पूरी कद्दू की सब्जी खा जाता। कोई मना करने की कोशिश भी करता तो उसे ही डांट पड़ जाती।
एक बड़े भैया से वो थोड़ा डरता था जो उसे छत पर ले जाकर डरा धमका कर दूध पिलाता था।रात को रोने लगता तो ग्रिल का ताला खोलकर उसको नीचे बाबा के पास पहुचाना पड़ता। और 10 मिनट भी नहीं होते कि वापस मम्मी के पास जाने की जिद करता। बाबा उसकी हर फरमाइश हर जिद पूरी करते।उसके रोने की आवाज़ सुनते ही बाबा सब पर चिल्लाना शुरू करते कि कौन क्या कहा वैभव को? वैसे बाबा उसको शंकर बुलाते थे। जहाँ भी जाते वैभव को साथ ले जाते थे।

जाड़े की अँधेरी रात थी।अचानक गाय खुलने की आहट पाकर बाबा निकले। रस्सी पकड़कर खूटे की ओर जा ही रहे थे कि पाँव फिसला हाथ से रस्सी छूटी और जा गिरे खूटे पर। खूटा लोहे का था और सीधे दायीं आँख में लगा। काफी खून बहने लगा और तुरंत उनको hospital ले जाया गया। जाने पर पता लगा कि आँख जा चुकी थी उसको बचाया नहीं जा सकता था। operate करके निकलना पड़ा। सब कुछ होते होते सुबह के आठ बज गए। नौ बजते बजते उनको घर लाकर drawing room में दीवान पर लिटाया गया।

तब तक वैभव उठ चुका था और बाबा बाबा करके सबको परेशान किये हुए था।बाबा को लेटा हुआ देखकर थोड़ा गंभीर हो गया। पास बैठकर पूछने लगा कहाँ गए थे?हमको क्यों नहीं ले गए?बाबा कहने लगे hospital गए थे। देखते नहीं हो आँख फूट गया।
तब वैभव का ध्यान गया कि एक आँख पर पट्टी है। थोड़ी देर सोचकर कहता क्या है दूसरा आँख फूटेगा तो हमको भी लेके जाना। उसका इतना कहना था कि उस उदासी भरे माहौल में भी सब मुस्कुरा दिए।
सच है बच्चे मन के सच्चे।

0 Comments

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

CONTACT US

We're not around right now. But you can send us an email and we'll get back to you, asap.

Sending

©2017 Kuch Teri Kuch Meri. All rights reserved.

or

Log in with your credentials

Forgot your details?