जब पापा खो गये

आज भी मुझे छोटे स्टेशन पे चढ़ने या उतरने में डर लगता है | फिर भी जब भईया ने फ़ोन पे हबीब गंज उतरने को कहा तो इनकार कि कोई गुंजाईश ना थी |

हबीब गंज, भोपाल से पहले एक छोटा स्टेशन | ज्यादा भीड़-भाड़ नहीं…और भईया के शब्दों में “मुझे यहाँ से receive करना आसान हो जायेगा”; जैसे कि भोपाल की भीड़ में वो मुझे पहचान ही नहीं पाता या फिर मैं उसे |

बहरहाल, ट्रेन सवेरे ३-४ बजे पहुँचने वाली थी | मेरा ऊपर वाला बर्थ था, सो हम दोनों उस पे सवार….मैं और मेरा बैग | इत्मीनान से बेडशीट बिछाया और चादर तान के सो गयी |

…. 7-8 साल कि रही हुंगी जब पापा और भईया ऐसे ही पटना से पहले एक छोटे से स्टेशन नुमा हाल्ट पे खो गए थे | हाँ सही पढ़ा आपने…खो ही तो गए थे दोनों | क्यूंकि मम्मी, सीमा और रुची तो मेरे साथ ही थे |

ट्रेन पटना स्टेशन पे पहुँचने से पहले एक हाल्ट पे धीमी हुयी ही थी कि पापा ने कहा कि यहीं उतर जाते हैं | खाली होने के कारण यहाँ से निकलना आसान होगा…और भी ना जाने क्या क्या |

ट्रेन के रुकने के साथ पापा और भईया तो उतर गए लेकिन हमलोग के उतरने से पहले ही कुछ लोग अनाज के बोर और बकरियां उतारने में लग गए | अब बिहार के ट्रेनों का हाल तो आपको पाता ही है |

तब तक सिग्नल ग्रीन हो चूका था और गाडी सरकने लगी |

“पापा खो गए, पापा छूट गए”…हम तीनों बच्चों का रोना गाना शुरू| ट्रेन में मौजूद लोग हमे चुप करने में लगे थे | ….अरे chain-pull करो…अरे TT को बुलाओ….जैसी अनगिनत कोलाहल | अभी ट्रेन रफ़्तार पकड़ी भी ना थी कि फिर से रुक गयी | हमलोग वापस से स्टेशन पहुंचे लेकिन पापा वहां भी नहीं |

और हम तीनों का बैकग्राउंड म्यूजिक तो चल ही रहा था अनवरत…पापा खो गए…भईया खो गया | मम्मी हमे किसी तरह चुप करते हुए स्टेशन से बाहर आई और फिर रिक्शा लेकर दादी के घर बोरिंग रोड, LIC कॉलोनी |

अभी भईया होता तो मेरी और उसकी कम्पटीशन हो जाती….अंकल अब रिक्शा left लो, अब right | लेकिन वो तो खो गया था और हम बिलकुल चुप |

आख़िरकार दादी के घर पहुंचे | शायद पापा के खोने का अब उतना दुःख ना रह गया था | 5 फुआ हो तो पापा और भी कम याद आते हैं|

भाभी…भईया? सोनू? का भईल? और पूरी कहानी फिर दोहराई गयी| मम्मी तो दुखी लग ही नहीं रही थी, जैसे कि वो चाहती ही हों कि पापा खो जायें |

पापा भी थोड़ी देर में सोनू के साथ घूमते फिरते पहुँच गए, शायद ये सोचते हुए कि चलो जान छुट्टी और 6 लाख भी बचे…2 लाख के दर से हम तीनों बहनों का दहेज़|

फुआ ने कहा कि पापा को परेशान करते हैं, तुमलोग बाद में सामने आना|

भईया…भाभी और बचीया सब? ई बार अकेले ही अईला?

….अरे आया नहीं सब? पटना स्टेशन पे भी नहीं मिला, हम अनाउंसमेंट भी करवाये | तब तक हम तीनों पापा – पापा कहते हुए उनके कंधे पे…|

आपलोग भूल ही गए, मैं तो हबीब गंज पहुँच भी गयी | आँख खुली तो ट्रेन बस हबीब गंज स्टेशन से निकलने ही वाली थी| Announcement सुनते हुए जल्दी से सामान समेटा और ट्रेन से बाहर|

प्लेटफार्म बिलकुल खाली और भईया का कहीं पाता नहीं | करीब 3.30 बजे होंगे सुबह के और सूर्य देवता देर तक दर्शन नहीं देने वाले थे|

मोबाइल फ़ोन privileged चीज थी और तब तक मेरे पहुँच से बाहर| खैर, प्लेटफार्म से बाहर आई कि कोई टेलीफोन बूथ मिले तो भईया को फ़ोन लगाऊ|  सड़क पे बिलकुल सन्नाटा, बूथ का कहीं नामो-निशाँ नहीं | ऑटो वालों का सामूहिक क्रंदन शुरू, ” मैडम ऑटो…मैडम कहाँ जाना है ”

अब address मालूम हो तब तो ऑटो लेके चली भी जाऊ| एक अनजान शहर अँधेरे में और भी भयानक लगता है | तब तक फूल डिजाईन का काला शर्ट पहने एक लड़का नजर आया| लगा कि भईया है | वो ही था | अब जान में जान आई |

हमलोग बातचीत करते हुए ऑटो कि ओर बढ़ रहे थे…..

 

 

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