मन की शक्ति

हम को मन की शक्ति देना मन विजय करें।
दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें

काफी अजीब लगता था की कोई खुद की जय- खुद के लिए जिन्दाबाद कैसे कर सकता है।

मारने के सरे विकल्पों में जल के मरना मुझे सबसे भयावह लगता है। वैसे डूबना, ऊँचाई से गिरना भी बचपन के nightmares रहे हैं मेरे । मेरे नाना जी की मौत हार्ट अटैक से हुई थी तो लोगो का कहना था की वह सुखद मृत्यु थी और ये उनकी इच्छा भी थी….चलते फिरते मौत। कष्ट तो फिर भी हुआ ही होगा। तो मैं थोड़ी देर के बाद भगवान पे ही अपने मरने की मनोकामना का निर्णय छोड़ देती हूँ।

बचपन में मम्मी मुझे TV के आगे बैठा कर घर के कामों में लग जाती। और फिर न्यूज़ हो या शास्त्रीय संगीत, हिंदी या इंग्लिश, मैं दुनिया भूल के TV के अंदर। एक दिन दहेज़ प्रथा के ऊपर  कोई नाटक आ रहा था जिसमे बहू जला के मार दी जाती है।

मम्मी खाना बना रही थी, मैं धीरे से पास जा के बैठ गई……’मम्मी….’…..

कई बार की कोशिश और पापा से ना कहने की promise के बाद मैंने मम्मी से कहा: “जब मेरी शादी कीजियेगा तो ये घर बेच के बहुत सारा दहेज़ दीजियेगा नहीं तो वो लोग मुझे जला देगें।” तब ये नहीं जानती थी की वो सरकारी घर है।

फिर मम्मी ने पूछा “फिर हमलोग कहाँ रहेंगें?”

“भईया के पास, पर मेरे यहाँ मत आइयेगा नहीं तो वो लोग मुझे जला देंगें।” मेरे मन में वो नाटक कहीं अंदर तक बैठ चूका था ।

इतने मान मुन्नवल के बावजूद ये बात पापा तक भी पहुँच ही गई।

मेरे मासूम मन पे जो ड्रामे का प्रभाव पड़ा उसे हटाने के लिए मुझे पापा ने समझाया। फिर एक दिन राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देती किरण बेदी को TV पे दिखा पापा बोले ,देखो ये भी तो लड़की है……ये कहानी पापा मेरे बड़े होने पर सबको सुनाते और मुझे शर्मिंदा करते। और देखिये आज मैं खुद को सार्वजनिक शर्मिंदा कर रही हूँ।

स्कूल की छोटी मोटी कोई भी बात मैं पापा से कहती तो पापा अक्सर कहते कोई भी दिक्कत हो प्रिंसिपल सर के ऑफिस चले जाओ। स्कूल तक तो सब सुलभ ही था छोटा शहर होने के कारण पापा की पहचान हर जगह थी। कॉलेज के एडमिशन के लिए भी जब हम जाते तो लड़कियों को अकेले किसी से सीट/रास्ता लेते दिखा पापा कहते देखो ऐसे बोल्ड बनो डरो नहीं।

हॉस्टल से 3 घंटे लगता, वीकेंड्स पे घर आ जाती तब भी पापा को चिंता तो लगी ही रहती थी।

पर जब पहली बार दिल्ली आने का विचार मैंने पापा के आगे रखा तो पापा बोलेे बड़ा शहर है अकेले कैसे करेगी। बहुत दुर्घटना होता रहता है। हमेशा बोल्ड बनने के लिये बोलने वाले पापा मुझे डराने लगे थे। तब तो कह दी “कुछ होना होगा तो पापा घर में भी होगा, वरना सड़क पे भी नहीं।”

पर आसान नहीं था। बस में छेड़छाड़ पे भी मैं रुआँसी हो जाती थी। हॉस्टल की लड़कियाँ जूनियर तक फिर मुझे टिप्स देते……..पर कोई टिप्स काम नहीं आते यदि आप स्वयं बोल्ड नहीं होते।

ऐसे ही छेड़छाड़ पे जब पहली बार एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति का हाथ झट पकड़कर डाँटि और फिर traffic police की मदद से उसे बस से निचे उतरवाया तो लगा इतना मुश्किल भी नहीं था।

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