लकड़ी की काठी काठी का घोड़ा

सालो बाद आंटी से घर पे मुलाकात हुई | उन्हें देख के तो मैं पहचान ही नहीं पाई पर फिर ये बताने पर कि वो दुर्गा राम अंकल की पत्नी हैं बहुत कुछ आँखों के आगे से गुजर गया |

“याद है?”

“कैसे भूल सकती हूँ, आपके घर में एक लकड़ी का घोड़ा था जिससे हम खेला करते थे |” लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा…… सच में मेरी यादों में तो काठी का घोड़ा वही एक था | आज भी ये गाना मुझे उन्हीं के घर के उस घोड़े तक ले जाता है|

याद है तुमको कहते हुए जब आंटी मेरे गाल पे हाथ रखी तो उनकी आँखें छलक आयी थी | फिर आंटी के गले लग के मैंने कहा था “आंटी अब तो आपके अच्छे दिन आ गये है, बुरा वक्त तो ख़त्म हो गया |

पापा के बहुत खास दोस्त थे दुर्गा राम अंकल, दोनों साथ ही सर्विस में आये थे| पापा और अंकल शुरुवात में कुछ वक़्त तक साथ ही रहते थे | जब पापा को diabetes  हुआ तो काफी समय तक वो पापा को इंजेक्शन देने भी आया करते थे, जब तक पापा ने खुद से ना सीख लिया |

और फिर एक सुबह….रात से भी काली हुई थी | दुर्गा राम अंकल ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी | सभी लोग उनके घर गए थे | तब जिंदगी और मौत का अर्थ भी नहीं मालुम था | पापा मम्मी ने मना किया था लेकिन उनके पीछे भईया के साथ मैं भी चली गई | अंकल के घर के आगे भीड़ लगी थी; खिड़की  से दिख रहे थे पंखे से झूलते अंकल……

सब कुछ बदल गया उस दिन से…….अंकल का घर अलग सा ही दिखने लगा था | दुःख और बुरे वक़्त का पर्याय बन गया था वो घर | कभी कभी आंटी को सफ़ेद साड़ी में उनके दो छोटे छोटे बेटों के साथ बैठे देखा था बरामदे में| जैसे वक़्त रुक गया था आंटी के लिए और लोग तो शायद भूल ही गए थे कि वो भी एक घर है वहाँ|

अँधेरा होने पर मेरे दोस्त भी उस घर के सामने से नहीं गुजरते | मैं, जो लाइट ऑफ हो तो पलंग से नीचे पैर करने में भी डरती थी, उस रास्ते से गुजर आती दोस्तों को ये कहते कि भूत नहीं होता | ये तो झूठ होगा अगर मैं कहूँ कि मुझे डर नहीं लगता था पर हाँ अंकल का डर नहीं लगता था | ये बात और है कि जी हॉरर शो और आहट के सारे करैक्टर मुझे अपने पीछे ही लगते थे |

इन सालो में हमेशा सोचती रही हूँ मौत का फैसला बेशक मुश्किल होता होगा पर जिन्दगी का फैसला अधिक मुश्किल होता है क्या | चाहे कर्ज में डूबा किसान हो या रैगिंग से परेशान बच्चे, टूटते रिश्ते हों या परीक्षा में नाकामयाबी…… जो चले गए उनको बुलाना तो मुमकिन नहीं पर आने वाले जनरेशन को ये समझना चाहिए और समझाना भी चाहिए | ये सच है कि जाने वाले के साथ कोई नहीं जाता पर वो अकेला भी तो नहीं जाता, साथ ले जाता है बहुत कुछ और पीछे छोड़ जाता है काठ बनी ज़िंदगियाँ काठ के घोड़े सी | अब मन बहुत उदासिन हो गया है तो चलिए फिर आंटी के पास चलते है |

आंटी का बड़ा बेटा MBA कर के कहीं नौकरी कर रहा था और छोटा तब मेडिकल की पढाई कर रहा था अब तो डॉक्टर बन भी गया होगा | अब सुबह हुई रोशनी वाली | आंटी से उनका नंबर भी ली थी पर कभी कॉल ना कर सकी | ये एक बुरी आदत है मुझमें, याद तो अक्सर करती हूँ पर दोस्तों रिश्तेदारों को कॉल नहीं करती | चलिए आज कॉल कर लेती हूँ |

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