ये शैतान की खालाएँ

“ये शैतान की खालाएँ….. चश्मा, जीन्स पहनती हैं।…. मार दूँगा सबको…ख़त्म कर दो।”

मुस्लिम प्रधान यूनिवर्सिटी में पढ़ने के कारण आधे से ज़्यादा दोस्त मुस्लिम ही थे। वैसे यूनिवर्सिटी से पहले भी एक-आध मुस्लिम दोस्त तो हर स्कूल कॉलेज में थे ही…. और हमारी परवरिश में कभी भी, कहीं भी जातिवाद धर्मवाद नहीं था और ना ही आज इस विवरण को लिखते वक़्त। ये सिर्फ एक घटना है, जो आज भी उसी तरह ताजा है जैसे मानो कल की बात हो।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी । उस दिन काफ़ी देर हो गई प्रोजेक्ट बनाते बनाते। वैसे भी कॉलेज में किसे जल्दी पड़ी होती है घर  जाने की। दो दोस्त वहीँ आस पास के थे तो

“अच्छा भाई शब्बाख़ैर…. कल मिलते हैं।”

लड़के गले लग कर और  मैं एक ‘प्यारी’ मुस्कान के साथ अपने अपने रास्ते को हो लिए। अब क्योंकि पहले ही काफी देर हो चुकी थी तो कैंपस के सामने वाली बस स्टॉप पर इंतजार करने की बजाय हम तीन आगे बढ़ लिए, थोड़ी अधिक चलती फिरती सड़क की ओर…. इस उम्मीद में की वहाँ से बस आसानी से मिल जायेगी।

हम तीन थे तो बातें करते हँसते बोलते न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के स्टॉप पर खड़े हो गए।

थोड़ी ही देर में एक बस आई। बस भोगल होती हुई लाल क़िला की ओर जाती शायद। अगर साथ हो दो बॉडीगार्ड…. तो राह और राहगीरों की क्या परवाह…. तो दोस्तों के इशारे पे बिना बस नंबर देखे ही बस में सवार….. “ITO से दूसरी बस ले लेंगे”

तब बस-पास था और कूद फाँग की फुर्ती भी…. बस बदलना…रूट लंबा कर के भी जाना पड़े तो परवाह नहीं।

मैं एक लेडीज सीट पे बैठ गई, आखिर सीट का प्रलोभन कैसे छोड़ देती…. तब प्रतीक और राहुल वही पास में खड़े हो कर बात कर रहे थे। दोनों ही पतले दुबले लम्बे…राहुल उस दिन जींस और कुर्ता पहने और प्रतीक गहरे रंग की टी-शर्ट और ब्लू जीन्स…..अब मैं कोई श्रृंगार रस की कवयित्री नहीं जो उनका इससे अधिक कोई विवरण दे सकूँ। 4-5 महीने साथ पढ़ते हुए भी उनका कोई स्केच खींच पाना तब जितना मुश्किल था आज सालों की दोस्ती के बाद भी उतना ही।

कभी कभी पीछे मुड़ कर उनको देख लेती….खड़े ही हैं… कॉलेज के आसपास के बस में सीट की उम्मीद होती भी नहीं, दिल्ली में तो हरगिज़ नहीं।

अगले स्टॉप पे कुछ लोग उतरे तो कुछ चढ़े भी, एक आम सी घर वापसी दिन भर की व्यस्तता के बाद।

सफ़ेद कुर्ता, काला जैकेट, सफ़ेद मुस्लिम टोपी, लंबी काली डाढ़ी…उसके पहनावे में कुछ भी ऐसा नहीं था की नज़र ठिठके….ये भेष भूषा तो आम ही था पर तभी बस की सीढ़ियो से ही उसकी आवाज…… भारी भयावह…. “ये शैतान की खालाएँ….. मार दूँगा सबको….ख़त्म कर दूँगा…. जीन्स पहनती हैं…. चश्मा लगाती हैं….”

“मार दूँगा सब को”

वो यूँ ही कुछ कुछ बड़बड़ाते बस में आगे बढे जा रहा था। वो आवाज मेरे अंदर तक गहराती जा रही थी “जला दूँगा सबको मार दूँगा सबको”।

पीछे देखा तो प्रतीक और राहुल तब वहाँ नहीं थे आगे पीछे सेटों पे नजर दौड़ाई तो भी कही दिखे नहीं…ये दोनों मुझे अकेली छोड़कर कहाँ गायब हो गए, सोच ही रही थी की तब तक वो मेरे आगे की सीट के सामने खड़ा था, वहां बैठी लड़की पे चीखते हुए ” उठ शैतान की खाला उठ मैं बैठूंगा….उठ जा नामुराद…. जला दूँगा….उठ मैं बैठूंगा”।

आसपास के लोग उसको दूसरे सीट पे बैठने को बोल रहे थे लेकिन उसने तो जैसे ज़िद ही पकड़ ली थी… बचपन में Duck Tales में सुनाई देने वालेे जैकब मार्ले के भूत की आवाज साक्षात् कानों में सुनाई दे रही थी…

हाथ पाओं फूल गए.. मैं धीरे से अपना मोबाइल निकाल चुकी थी.. वो सनकी सामने की लड़की के गले की और हाथ करता उसे भी आतंकित कर रहा था और साथ ही मुझे भी… मोबाइल में घबराते हुए 100 टाइप की…..हरा बटन दबाने ही वाली थी की 4-5 लड़के उसे दबोच चुके थे। मैं भागी आगे ड्राईवर सीट की ओर। फिर सब संभल गया था… 100 की जरुरत नहीं पड़ी…..।

उस आदमी को बस की लास्ट सीट पे 2 लड़के दोनों बगल से दबा कर बैठ गए। मैं वापस अपनी सीट पे आई तो राहुल वहां खड़ा था “तुम कहाँ भाग गई थी…इतने लोग तो हैं, डरपोक…..”

हाँ हाँ तब तो दोनों दिख भी नहीं रहे थे।

इसके बाद तो जैसे कोई पीर फ़क़ीर की आत्मा उसमें घुस गई हो….”अब मैं हज़रत साहब के दरबार में जाऊँगा…. उनकी इबादत करूँगा…..” पुरे रास्ते ज्ञान और अध्यात्म की बातें करते ।

तब हमारी बस निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के आगे से गुज़र रही थी। ना मालूम किस रूहानी ताक़त ने उसे शान्त कर दिया था

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