जिंदगी में,रिश्तों से-हमारी अपेक्षाएँ

    अपेक्षायें……….
जिंदगी में,रिश्तों से-हमारी कितनी अपेक्षाएँ रहती हैं।

दरअसल हम एक मूरत गढ़ लेते हैं मन में-पति को ऐसा होना चाहिए बच्चे को ऐसा होना चाहिए। फिर आगे चलकर जब वास्तव में वो सम्बन्ध बनते हैं,उन व्यक्तियों से मिलना होता है-तो वो कुछ और ही होते हैं। यहाँ तक की अपने बच्चे भी। कल्पना में-आदर्श रूप में-कोई छवि तैयार होते रहती है-हमारे हिसाब से। लकिन असल व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व है…।अपनी सोच ,अपने आदर्श ।अपना जीने का सलीका ।

जो बातें मेरे लिए अहम् हैं ,जरूरी नहीं है की उसके लिए भी हों ।वो अपने तरह से व्यहवार करेगा ,अपने ढंग से react करेगा।
मेरी बनाई image और उसमे हो सकता है की कोई तालमेल ही न हो।

इस धक्के को झेल पाना सहज नहीं है। उस छवि में-उस मूरत में-सामने वाले को fit करना आसान नहीं है। अपनी गढ़ी मूरत को टूटते देखना दुखद है। लकिन गलती अपनी ही है। व्यक्ति से मिलने के पहले हमने इतनी कल्पनाएँ की ही क्यों?प्रत्येक व्यक्ति की सॊच अलग होती है,इतना तो समझना ही चाहिए था ना।

ठीक है सामने वाले की सोच ,व्यक्तित्व ,व्यहवार पर मेरी पकड़ नहीं हो सकती है। लकिन अपने पर तो है। अपने ओर से अगर हम अपेक्षाएं रखना छोड़ दें-तो शायद—शायद जिंदगी आसान हो जाये—–

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