‘ज़िन्दगी’ ज़िन्दगी बन गयी है

‘ज़िन्दगी’ ज़िन्दगी बन गयी है। मैं हाल ही में शुरू हुए ज़िन्दगी channel की बात कर रही हूँ। आजकल ज्यादा समय इसी channel पर आ रहे serials को देखने में गुजरता है। बहुत पहले दूरदर्शन पर कभी कभी short stories पर बना serial कुछ इसी तरह का होता था।वैसे तो सभी serials अच्छे लग रहे हैं पर अभी ‘मेरे कातिल मेरे दिलदार ‘ काफी अच्छा लग रहा है।

माहम और ओमर एक दुसरे से प्यार करते हैं। ओमर के घरवाले इस शादी से खुश नहीं हैं। काफी आरजू मिन्नतें करके ओमर अपने घरवालों को इस शादी के लिए राज़ी करता है। ओमर का बड़ा भाई बख्तियार भी अपने पिता से इस शादी की सिफारिश करता है। जबकि बख्तियार भी माहम को पसंद करता है। घर में एक बुआ हैं जो अपनी बेटी को ओमर की दुल्हन बनाना चाहती हैं। ऐसा हो नहीं पाया तो सारी कड़वाहट माहम पर निकालती हैं। माहम ऐसे माहौल में adjust करने की बहुत कोशिश करती है। पर घर में सभी उसके विरूद्ध हैं।

ओमर को कुछ बताने की कोशिश करती है तो वो सुनना नहीं चाहता और उसे समझाता है कि बुआ की बात मानकर रहे और उनसे बहस ना करे। बख्तियार भी माहम को अकेला पाकर उसे परेशान करता है। माहम ओमर को बताना चाहते हुए भी बता नहीं पाती। आखिर एक दिन सब्र का बाँध टूटा और माहम ने बख्तियार पर इलज़ाम लगा ही दिया। ओमर को भी कहाँ बर्दाश्त होने वाला था। उसने माहम को उसी वक्त तलाक दे दिया।माहम अपने घर वापस जाती है। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी होती जाती हैं कि माहम को बख्तियार से शादी के अलावा और कोई रास्ता नहीं सूझता। वो शादी करके फिर से उसी घर में आती है। इस बार बख्तियार की बीवी बनकर।

कहानी का अन्त तो पता नहीं क्या होगा लेकिन एक अच्छी भली मासूम लड़की किस तरह से villain बन रही है ये देखकर दुःख होता है। सवाल ये है कि अच्छे बनने से काम नहीं बना तो जीने के लिए बुरा ही बनना होगा क्या?

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